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टीएचडीसी, ऋषिकेश में कवि सम्मेोलन का आयोजन

 

टीएचडीसी इंडिया लि. के कारपोरेट कार्यालय, ऋषिकेश में हिंदी अनुभाग (का.एवं प्रशा.) के सौजन्‍य से 17 मार्च, 2017 को रसमंजरी मनोरंजन सदन में भव्‍य कवि सम्‍मेलन का आयोजन किया गया।

 

कवि सम्‍मेलन में निगम के अध्‍यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, श्री डी.वी.सिंह, कार्यपालक निदेशक(ओएमएस), श्री एच.एल.अरोड़ा, कार्यपालक निदेशक (परिकल्‍प एवं अभियांत्रिकी), श्री आर.के.विश्‍नोई ने सपरिवार गरिमामयी उपस्‍थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई इस अवसर पर महाप्रबंधक (कार्मिक एवं प्रशा.), श्री विजय गोयल, महाप्रबंधक(वाणिज्‍यक), श्री अजय कुमार माथुर एवं महाप्रबंधक(कारपोरेट नियोजन), वी.के.बड़ोनी, कोटेश्‍वर कार्यालय से महाप्रबंधक(परियोजना), श्री पी.के.अग्रवाल तथा अनेक वरिष्‍ठ अधिकारी एवं कर्मचारी सपरिवार उपस्‍थित थे ।

 

कार्यक्रम का संचालन करते हुए हिंदी अधिकारी, श्री पंकज कुमार शर्मा ने सर्वप्रथम कार्यक्रम में उपस्‍थित विशिष्‍ट अतिथि, मुख्‍य अतिथि, मेहमान कविगणों, विभागों के प्रमुखों, वरि. अधिकारियों एवं कर्मचारियों एवं उनके परिवारों का अभिनंदन और स्‍वागत किया।

 

आमंत्रित प्रमुख कवि श्री गजेन्‍द्र सोलंकी ने ''सरस्‍वती वंदना'' के साथ कवि सम्‍मेलन का शुभारंभ किया ।  कवि सम्‍मेलन में कविगणों ने देशभक्‍ति, ओज, श्रृंगार एवं हास्‍य व्‍यंग्‍य से युक्‍त काव्‍य पाठ एवं कटाक्षों से श्रोताओं को मंत्र मुग्‍ध कर दिया ।

 

सर्वप्रथम मध्‍य प्रदेश से आए कवि श्री राधाकांत पांडे ने हिंदी भाषा, देशप्रेम तथा ओज की अनेक कविताएं सुनाकर ‍नी ‍ीर रचनाआें अपनी कमाई पर श्रोताओं की खूब तालियां बटोरी । उनके काव्‍य के कुछ अंश इस प्रकार थे-

 

राजराज्‍य आए बापू वाला सपना हो पूरा, योगी और तपस्‍वियों का फिर से प्रताप हो

कंचनों का थाल सजाओ विश्‍व हिंद द्वार खड़ा, चहुं और हिंद वाला फिर से जाप हो

भारती का स्‍वाभिमान हिंदी का बढ़े जो मान, सुख शांति का विधान दूर संताप हो,

हिंदी का ही हाथ थाम भारत है पुण्‍य धाम, हिंदी बिन हिंद जैसे बेटी बिन बाप हो ।

 

हाथरस से आए श्री पदम अलबेला ने अपनी काव्‍य रचनाओं से श्रोताओं को हास्‍य रस से सराबोर कर दिया । उनके हास्‍य के कुछ अंश प्रस्‍तुत हैं

 

क्‍या है ये बुढापा बस खो मत आपा, खिलता हुआ अंग-अंग होना चाहिए,

बहु और बेटों के रंग में करो न भंग, टाइप पास करने का ढंग होना चाहिए ।

 

नैनीताल से आई सुश्री गौरी मिश्रा ने श्रृंगार रस से भरपूर अपना काव्‍य प्रस्‍तुत कर श्रोताओं की खूब तालियां बटारी, उनके काव्‍य के कुछ अंश नीचे दिए गए हैं  -

 

गुलाबी नोट से ज्‍यादा गुलाबी गाल कर दूंगी,

तुम्‍हें अपनी मोहब्‍बत से मैं माला-माल कर दूंगी ।

 

मथुरा से आए श्री मनवीर मधुर ने अपनी ओजपूर्ण कविताओं एवं वाणी से श्रोताओं को रोमांचित कर दिया । उनके काव्‍य के कुछ अंश प्रस्‍तुत हैं

 

एकता की बेल की जड़ों में जो डाली छाछ,  अपने लहू से फिर बेल सींच लेंगे हम

और किसी व्‍यक्‍ति या विचार का विरोध हो तो, शांति हेतु उस पे भी आंख मींच लेंगे हम

धर्म के विरूद्ध युद्ध वाला भाव देखा यदि, ज्‍यादा कुद्ध होके मुठ्ठियों को भींच लेंगे हम,

किंतु यदि देश द्रोही भाषा बोलने लगे तो, देश की कसम वो जुबां को खींच लेंगे हम ।

 

बनारस से आए डॉ. अनिल चौबे ने अपनी हास्‍य रचनाओं एवं व्‍यवस्‍था पर तंज कसते हुए श्रोताओं को हंसा-हंसा कर लोटपोट कर दिया । उनके काव्‍य के कुछ अंश प्रस्‍तुत हैं

 

जितना तू बढ़-चढ़ बोलता है पाक प्‍यारे, उतने हमारे यहां कुत्‍ते भूंख देते हैं

तेरे कारखाने धुंआ जितना उगलते हैं, उतने की साधु यहां पी जाते चिलम हैं

पाक कभी हिंद की बराबर न हो सकेगा, आज तुझे उत्‍तर ये हम अचूक देते हैं

जितने की दाल रोटी खाते पाकिस्‍तान वाले, उतने की खाके बिहारी तंबाकु थूक देते हैं ।  

 

अंत में दिल्‍ली से पधारे श्री गजेन्‍द्र सोलंकी ने राष्‍ट्र प्रेम की भावना से ओतप्रोत अपने काव्‍य से श्रोताओं को बार-बार तालियां बजाने पर विवश कर दिया । उनके काव्‍य के कुछ अंश प्रस्‍तुत हैं

 

युगों युगों तक इस धरती पे भारत मां की शान रहे, रामकृष्‍ण गौतम के वंशज वाली ये पहचान रहे,

रामायण की तांतुरांत, गुरूग्रंथ साहिब हो होठों पर, लेकिन सबसे पहले हर दिल में हिंदुस्‍तान रहे ।  

       

कार्यक्रम के अंत में वरि.प्रबंधक(हिंदी), श्री अशोक कुमार श्रीवास्‍तव ने उपस्‍थित विशिष्‍ट अतिथियों, कविगणों एवं श्रोताओं का उनकी उपस्‍थिति के लिए एवं कार्यक्रम के आयोजन में जुटे विभिन्‍न विभागों  के अधिकारियों एवं कर्मचारियों का धन्‍यवाद एवं आभार व्‍यक्‍त किया।

 

 
             
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