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कारपोरेट कार्यालय, ऋषिकेश में कवि सम्मेलन का आयोजन

टीएचडीसी इंडिया लि., कारपोरेट कार्यालय, ऋषिकेश में हिंदी अनुभाग (का.एवं प्रशा.) के सौजन्‍य से 16 मार्च, 2016 को रसमंजरी मनोरंजन सदन में भव्‍य हास्‍य कवि सम्‍मेलन का आयोजन किया गया।

 

कवि सम्‍मेलन में निगम के अध्‍यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, श्री आर.एस.टी.शाई एवं श्रीमती पद्मावती शाई, निदेशक(कार्मिक), श्री एस.के.बिस्‍वास एवं श्रीमती समिता बिस्‍वास तथा निदेशक (वित्‍त), श्री श्रीधर पात्रा एवं श्रीमती सुष्‍मिता पात्रा ने अपनी गरिमामयी उपस्‍थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। हास्‍य कवि सम्‍मेलन में महाप्रबंधक (परि.-सिविल), श्री आर.के.विश्‍नोई, महाप्रबंधक (वाणिज्‍यक), श्री अजय कुमार माथुर एवं महाप्रबंधक (कार्मिक एवं प्रशा.), श्री विजय गोयल, एवं महाप्रबंधक (वित्‍त एवं लेखा), श्री जे.बेहरा तथा  वरिष्‍ठ अधिकारीगण एवं कर्मचारीगण सपरिवार उपस्‍थित थे ।

 

कार्यक्रम का संचालन करते हुए हिंदी अधिकारी, श्री पंकज कुमार शर्मा ने सर्वप्रथम कार्यक्रम में उपस्‍थित विशिष्‍ट अतिथि, मुख्‍य अतिथि, मेहमान कविगणों, विभागों के प्रमुखों, वरि. अधिकारियों एवं कर्मचारियों एवं उनके परिवारों का अभिनंदन और स्‍वागत किया। उन्‍होंने बताया कि यह हास्‍य कवि सम्‍मेलन होली से पूर्व आयोजित कराने का उद्देश्‍य कारपोरेट कार्यालय, ऋषिकेश के अधिकारियों एवं कर्मचारियों में नई ऊर्जा का संचार करना तथा होली के त्‍योहार तक सतरंगी रंगों में सराबोर करना है। इस आयोजन से निश्‍चित ही राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार को भी बल मिलेगा।    

 

आमंत्रित कवियित्री श्रीमती पद्मिनी शर्मा के द्वारा ''सरस्‍वती वन्‍दे शारदे, जगमग जग कर दे'' पंक्‍तियों से  मां सरस्‍वती के आहवान के साथ कवि सम्‍मेलन का शुभारंभ हुआ। इस हास्‍य कवि सम्‍मेलन में कविगणों ने अपनी कविताओं एवं कटाक्षों से हास्‍य एवं व्‍यंग्‍य का रंग बिखेरते हुए दर्शकों को हंसा-हंसा कर लोटपोट कर दिया ।

 

सर्वप्रथम मोदीनगर से आए कवि श्री बलवीर सिंह खिचड़ी ने ' जिन्‍हें हे पूरा भरोसा अपनी कमाई पर, उन्‍हें किसी की चुराकर लानी नहीं पड़ती, और चलते है वक्‍त से मिलाकर कदमताल, उन्‍हें परेशानी उठानी नहीं पड़ती'' एवं '' सभी के जीने का अलग अंदाज होता है, कोई महलों में भिखारी की तरह जीता है, कोई फुटपाथ पर बेताज होता है, और कुछ न बन पाएं तो बन जाएं पत्‍नी भक्‍त, क्‍योंकि नारी का सम्‍मान ही राष्‍ट्र का सम्‍मान होता है'' ‍नी ‍ीर रचनाआें अपनी कमाई पर  से दर्शकों/श्रोताओं की खूब तालियां बटोरी।

 

दिल्‍ली से आए श्री शम्‍भु शिखर ने अपनी काव्‍य रचना '' चीनी को जमाकर फिर इसे गन्‍ना बना दूं, हीरा दे मुझको फिर उसको पन्‍ना बना दूं, टोपी वो बेचता है दो लाख की बाबूजी, ला बीस रूपए दे मैं तुझको अन्‍ना बना दूं'' तथा ''दोनों हाथों में पकड़ पिचकारी कि आओ होली खेलें रसिया'' से श्रोताओं को खूब हंसाया।

 

गुडगांव से आई श्रीमती पद्मिनी शर्मा ने '' प्‍यारा मुझे बहुत था मगर छोड़ के आई, हंसते हुए बचपन का नगर छोड़ के आई, बस एक इलतजा है मेरा दिल ना दुखाना, तेरे लिए मां-बाप का घर छोड़ के आई'' जैसी नारी जीवन की वास्‍तविकता को चरित्रार्थ किया वहीं ''मेरा सावरियां ना समझे मेरी पीर दुनिया के दुख बांटता'' फिरे जैसी हास्‍य रचनाओं का रस बिखेरा।

 

दिल्‍ली से आए श्री चिराग जैन ने छोटे-छोटे व्‍यंग्‍य प्रस्‍तुत कर श्रोताओं को गुदगुदाया। उन्‍होंने ''सारी दुनिया से हटकर है, उल्‍लास पिता होने का.......'', व ''जलेबी को स्‍त्रीलिंग की संज्ञा देते हुए कहा कि  जलेबी टूट सकती है, सीधी नहीं हो सकती'' तथा ''अब वजीरों, अफसरों व पागलों को छोड़कर कौन हंसता है इस देश में''  जैसे व्‍यंग्‍यों से श्रोताओं को हंसा-हंसा कर लोटपोट कर दिया ।

 

अंत में दिल्‍ली से पधारे श्री मोहिन्‍द्र शर्मा  ने ''फोड़ दो लाख बम बेशक, नहीं कुछ हाथ आएगा, घिनौने कारनामों से तिरंगा झुक ना पाएगा'' जैसे अपनी ओजपूर्ण छंदों तथा व्‍यंग्‍य बाणों से आज के सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश पर प्रहार करते हुए श्रोताओं की खूब तालियां बटोरी।      

       

कार्यक्रम के अंत में हिंदी अधिकारी, श्री पंकज कुमार शर्मा ने उपस्‍थित विशिष्‍ट अतिथियों, कविगणों एवं श्रोताओं का उनकी उपस्‍थिति के लिए धन्‍यवाद एवं आभार व्‍यक्‍त किया।

 

 

 
             
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